न जाने कोन पहर किसने दस्तक दी

My friend wrote really beautiful poem that I couldn’t resist to share it on my wordpress site.Hope you all will like it.

न जाने कौन पहर ठहरा है , ना जाने किसने दस्तक दी,
मन की चौखट पर आये मोती , न जाने किसने मस्तक दी।
इन सुहानी शाम से पूछो , बहती नदियों के नाम से पूछो,
पूछो की वह कितनी कितनी खूबसूरत है,
पूछो की प्रेम की क्या मूरत है।
सोचता हूं जड़ दु सितारे उसके आँचल में,
या कभी सोचता हु भर लू उसे अपने ही आँचल में।
रह लूंगा वीराने में, सहारे उसने जो खुशियां दी
न जाने कौन पहर ठहरा है, न जाने किसने दस्तक दी।

रात के आगोश में, बातों का कोलाहल है
है अब सब कुछ थमा हुआ सा, अनजानी सी हलचल है।
रात के अंधियारों में नींदे करवट लेती है।
मखमल के कपड़े भी छूने से सलवट लेती है ।
एक सिरहन सी दोड़ पड़ी है, छूने के कम्पन्न से
में जाहिर करू अपने जज़्बातों को, एक किसी चुम्बन से।
में महसूस करता हु तुझे, जो राते तूने अब तक दी।
न जाने कौन पहर ठहरा है, न जाने किसने दस्तक दी।

Originally written by

Kamlesh Choudhary

2 thoughts on “न जाने कोन पहर किसने दस्तक दी

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